The best story in Hindi for kids with moral

The collection of the story in Hindi for kids. The story in Hindi is written in the Hindi language.
Hindi is the Indian language so the kids (child) can simply read the story in Hindi.

There are many types of story written. All types of story written in Hindi or English on the basis of age and problem and situation.
The motive of every story in Hindi or English provides information, gives motivation and makes enjoy full moment. story in hindi and watch story

the story in hindi with moral

एक बार राजा विक्रांत जंगल में भटक गए और महल का रास्ता भूल गए। शाम हो चुकी थी। कहीं कोई ठिकाना नहीं मिल रहा था। तभी एक किसान ने उन्हें देखा और अपने यहाँ ले गया। किसान ने बहुत ही आदर-सत्कार से राजा को अपनी कुटिया में ठहराया। किसान को यह नहीं पता था कि जिस व्यक्ति को उसने अपने यहाँ ठहराया है, वह एक राजा है।

अगले दिन सुबह राजा ने चलते वक्त किसान को अपनी जेब से निकालकर एक पहचान-पत्र दिया, जिस पर उनकी मुहर लगी थी। राजा ने कहा कि जब भी तुम्हें कोई कष्ट हो या तुम्हें किसी चीज की जरूरत हो तो इस पत्र को लेकर राज दरबार में हाजिर हो जाना। लेकिन किसान बहुत ही मेहनती था और अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट था। जैसे-जैसे समय गुजरता गया, वह इस घटना को भूल भी गया।

एक बार किसान गंभीर मुश्किलों में फिर गया। उसकी खेती चौपट हो गई थी। तभी उसे याद आया कि एक बार राजा ने उससे कहा था कि जब संकट हो तो मेरे दरबार में आ जाना। यही सोचकर वह राज-दरबार में पहुंचा और राजा ने जो परिचय-पत्र दिया था, वह दिखाया।

उस समय राजा पूजा कर रहे थे। लेकिन तब भी सुरक्षाकर्मियों ने किसान को राजा तक जाने के लिए इसलिए नहीं रोका, क्योंकि उसके पास राजा का दिया परिचय-पत्र था। किसान ने देखा कि राजा खुद जमीन पर बैठकर ईश्वर से मांग रहे हैं।

यह देख वह भौचक्का रह गया। इस घटना ने उसकी आत्मा और आत्मसम्मान को झकझोरकर रख दिया। किसान सोचने लगा- आखिरकार जब सबकुछ देनेवाला वह ईश्वरी शक्ति ही है तो फिर हमें किसी दूसरे इंसान से क्यों मांगनी चाहिए। यह सोचता हुआ वह लौटने लगा। तभी राजा ने उससे टोंका।

राजा किसान को पहचान गया था। राजा ने पूछा, “बताओ, क्या चाहिए तुम्हें?” इस पर किसान ने जवाब दिया, “महाराज, मैं तो यहां आपसे मदद मांगने आया था। लेकिन अब मैं भी उसी ईश्वर से माँगूँगा, जिससे आप ही मांग रहे थे।”

motivational story in hindi

मशहूर वैज्ञानिक सी.वी रमन ने सन 1949 में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की थी। उन्होंने वैज्ञानिक सहायक के पद के लिए एक विज्ञापन निकाला । कई उम्मीदवार आए । साक्षात्कार हुआ । साक्षात्कार का काम खत्म होने के बाद जब रमन बाहर आए तो उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति, जिसे उन्होंने नहीं चुना था, फिर भी वह अभी तक कमरे के बाहर बैठा हुआ था।

रमन उसके पास गए और पूछा, “आप यहां क्या कर रहे हैं? मैंने आपको बताया कि हम आपको नहीं रख सकते। तो फिर आप अभी तक यहां क्यों रुके हैं?” तब उस युवक ने कहा, “सर, मुझे मालूम है। लेकिन मैं तो अब यहां उस यात्रा भत्ते का पैसा लौटाने आया हूं, जो मुझे आपके दफ्तर ने भूलवंश ज्यादा दे दिया है।” इस पर रमन बोले, “अच्छा, तो यह बात है।”

वे उस नौजवान के कंधे पर हाथ रखते हुए अपने दफ्तर में ले गए और कहा कि अब इस पद पर तुम्हें नियुक्त किया कर लिया गया है। रमन ने नौजवान से कहा कि अब इस बात की कोई चिंता नहीं कि तुम भौतिक शास्त्र में मेरी कसौटी पर खरे नहीं उतरे। अब मैं तुम्हें बहुत ही शास्त्र पढ़ाऊंगा। तुम एक चरित्रवान युवक हो, मेरे लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।

A story in hindi

एक दूधवाली रोजाना एक मंदिर के पुजारी को दूध देने जाती थी। वह नदी पार से आती थी, इसलिए उसे अक्सर देर हो जाया करती। एक दिन पुजारी ने उसे फटकारते हुए पूछा कि आए दिन उसे देर क्यों हो जाती है? इस पर वह बोली, “मैं कर ही क्या सकती हूं? मैं तो घर से जल्दी ही निकलती हूं। लेकिन नदी के किनारे मुझे नाववाले और दूसरे यात्रियों का इंतजार करना पड़ता है।”

इस पर पुजारी ने कहा, “हे स्त्री, लोग तो भगवान का नाम लेकर समुंद्र तक पार कर जाते हैं और तुम एक छोटी सी नदी भी पार नहीं कर सकती?”

दूधवाली बहुत ही सीधी-सादी औरत थी। नदी पार करने को लेकर पुजारी ने जो बात कही, वह उसे अच्छी लगी। अगले दिन से वह दूध समय पर लाने लगी। एक दिन पुजारी ने पूछा कि अब कई दिनों से तुम समय पर कैसे आ पा रही हो तो दूधवाली बोली, “जैसे आपने मुझे बताया था, वैसे ही ईश्वर का नाम लेते हुए रोजाना नदी पार करते हुए आ जाती हूं, अब मुझे नाववाले का इंतजार नहीं करना पड़ता।”

दूधवाली की इस बात पर पुजारी को विश्वास ही नहीं हो रहा था। उसने कहा, “क्या तुम मुझे दिखा सकती हो कि कैसे नदी पार करती हो?” वह पुजारी को अपने साथ नदी की ओर ले गई।

उसने पानी पर चलना शुरू कर दिया। उसने पीछे मुड़कर देखा कि पुजारी की हालत खराब हो रही है। महिला ने कहा, “आप तो भगवान का नाम ले रहे हैं, लेकिन साथ ही अपने कपड़ो को पानी में भीगने से भी बचा रहे हैं? क्या आपको ईश्वर पर भरोसा नहीं है।”

Moral story in hindi

बहुत समय पहले की बात है। भोज नाम के एक राजा हुआ करते थे। वह बहुत ही निडर, बहादुर और न्यायप्रिय थे। उनके राज्य में सुख और शांति थी। एक दिन एक ब्राह्मण राजा के पास आया और बोला, “मेरी एक समस्या है और मुझे न्याय चाहिए।” इस पर राजा ने उससे समस्या पूछी।

ब्राह्मण ने बताना शुरू किया- 2 महीने पहले तीर्थयात्रा पर काशी गया था। मेरे पास बहुत ही बेशकीमती तीन पत्थर थे। मेरे घर पर पत्नी और बच्चे हैं। इसलिए मैंने पड़ोसी पर भरोसा किया और इस विश्वास के साथ कि वह इन पत्थरों की सुरक्षा रख लेगा, मैंने उसे ये पत्थर दे दिए। जब मैं तीर्थ करके लौटा तो पड़ोसी ने अपने तीनों पत्थर वापस मांगे।

लेकिन उसने कहा कि पत्थर तो उसने मेरी पत्नी को लौटा दिए है। लेकिन मेरी पत्नी का कहना है कि पड़ोसी ने उसे कोई पत्थर नहीं लौटआया। इसलिए मेरी आपसे विनती है कि पड़ोसी को बुलाकर पूछे और मेरे पत्थर मुझे वापस दिलवाए।

राजा ने ब्राह्मण की बात सुनने के बाद पड़ोसी को बुलवाया और उससे पूछा, “इसने क्या तुम्हें तीन पत्थर दिए थे?” क्या तुमने वाकई इस ब्राह्मण को तीनों पत्थर लौटा दिए? क्या उस समय कोई गवाह मौजूद था?”

पड़ोसी ने जवाब दिया, “हां, जब मैं ब्राह्मण की पत्नी को तीनों बेशकीमती पत्थर लौटाए तो उस वक्त मौके पर कोतवाल और सरपंच दोनों मौजूद थे।”

राजा ने कोतवाल और सरपंच को बुलाया। दोनों ने कहा कि उनके सामने ही इसने ब्राह्मण की पत्नी को पत्थर लौटाए थे।

इस पर राजा ने ब्राह्मण की ओर देखते हुए गुस्से में कहा, “तुम तो बहुत ही बेईमान हो। इस व्यक्ति के पास तो दो गवाह भी हैं, जो कह रहे हैं कि इसने तुम्हारी पत्नी को पत्थर लौटा दिए और तुम कह रहे हो कि पत्थर तुम्हारी पत्नी के पास नहीं है।

अगर तुम काशी नहीं गए होते और तीर्थ का पुण्य कामकर का नहीं लौटे होते तो मैं तुम्हें जेल में डलवा देता। जो कुछ तुम्हारे पास है, उसी में खुश रहो, दूसरे की चीजों को देखकर लालच मत करो।”

राजा का यह रवैया देखकर ब्राह्मण बहुत ही क्रोधित हुआ। उसने कहा, “आप कितने अन्यायी राजा है। आपसे अच्छा और सच्चा न्याय तो पहाड़ की टेकरी पर बैठे गडरिया बालक ही कर देता है। मै तो न्याय के लिए अब उसी के पास जाऊंगा।”

राजा भोज ने इस  गडरिए बालक के बारे में सुन रखा था। अब राजा के मन में इस गडरिए के न्याय को देखने की उत्सुकता जागी। उसने ब्राह्मण से कहा कि गडरिए के पास वह भी साथ चलेगा। दोनों गडरिए के पास पहुंचे और ब्राह्मण ने उसे  सारी बात बताई। इस पर गडरिए ने ब्राह्मण की पत्नी, पड़ोसी, कोतवाल और सरपंच को बुलवाया।

गडरिए ने सबसे पहले ब्राह्मण की पत्नी से पूछा कि क्या पडोसी ने उसे पत्थर लौटाए। उसने जबाब दिया , “नहीं।” लेकिन पड़ोसी अपनी इस बात पर डटा रहा कि उसने कोतवाल और सरपंच की मौजूदगी में ब्राह्मण की पत्नी को पत्थर लौटाए थे। कोतवाल और सरपंच ने भी पड़ोसी की बात को सही बताया।

इसके बाद गडरिए ने राजा भोज के अलावा सभी से थोड़ी दूर जाने को कहा और सबसे पहले कोतवाल को बुलाया। गडरिए ने कोतवाल से पूछा, “क्या तुम मुझे उन पत्थर के बारे में बता सकते हो? दिखने में कैसे थे पत्थर? उनका रंग कैसा था? कितने बड़े थे?”

कोतवाल ने जवाब दिया, “पत्थर बहुत ही सुंदर, नीले, तेज चमकवाले और नींबू जितने बड़े थे।”

इसके बाद उसने सरपंच को बुलाकर पत्थरों के बारे में यही जानकारी मांगी। सरपंच बोला, “पत्थर खून के रंग जैसे लाल और आकार में छोटे थे।”

गडरिए ने सभी को बुलाया और कहा कि पड़ोसी झूठ बोल रहा है। उसने पड़ोसी को आदेश दिया कि वह ब्राह्मण को उसके पत्थर लौटाए।

गडरिए के इस न्याय को देखकर राजा भोज बहुत ही प्रभावित हुए। उन्होंने गडरिए से पूछा, “तुमने ऐसा अच्छा फैसला आखिर दिया कैसे?” गडरिया बोला, “यह तो मैं नहीं जानता। जब मैं इस टेकरी पर बैठता हूं तो मै  न्याय प्रदान कर पाने में सक्षम हो जाता हूं और अगर कहीं दूसरी जगह होता हूं तो न्याय नहीं दे पाता।”

इस पर राजा भोज समझ गए कि जिस जगह यह बालक बैठा है, जरूर उसके नीचे कोई राज छुपा है, जिसकी वजह से वह बालक बुद्धिमत्तापूर्ण न्याय देता है। राजा ने उस जगह की खुदाई कराने का आदेश दिया। कुछ दिनों की खुदाई के बाद उसमें से एक सुंदर और विशालकाय सिंहासन निकला। इस सिंहासन में 32 महिलाओं की मूर्तियां लगी थी।

सिंहासन कीचड़ में डूबा था, लेकिन तब भी इसकी सुंदरता और भव्यता का अंदाज लगाया जा सकता था। राजा ने  इसे निकलवाकर साफ करवाया। भोज ने इतना प्यारा सिंहासन अब तक नहीं देखा था। यह उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था। राजा ने इसे तत्काल अपने बैठने के लिए तैयार करा लिया।

राजा ने इस नए सिंहासन पर बैठने के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाया। जैसे ही राजा ने सिंहासन की ओर पहला कदम बढ़ाया, उसमें लगी पहली मूर्ति जीवित हो उठी और कहने लगी, “हे राजन, ठहरो! यह सिंहासन बहादुर और पराक्रमी राजा विक्रमादित्य का है।

अगर तुम उन्हीं की तरह महान, साहसी, बहादुर, न्यायप्रिय हो, तभी इस पर बैठ सकते हो।” इसके बाद उस जीवित हुई मूर्ति ने राजा को राजा विक्रमादित्य के पराक्रम की कहानी सुनाएं।

कहानी सुनने के बाद राजा मन-ही-मन बहुत शर्मिंदा हुआ और उसने उस सिंहासन को उसी जगह रखवा दिया। कुछ दिन गुजर जाने के बाद राजा ने एक बार फिर इस तरह की कोशिश की। जैसे ही उसने सिंहासन की ओर कदम बढ़ाया, मूर्ति जीवित हो उठी और उसने भी विक्रमादित्य की महानता की गाथा सुनाई। ऐसा 32 बार हुआ।

यहीं से सिंहासन बत्तीसी की कहानी शुरू हुई।

the story in hindi for kids is written in hindi language and some heading is written in english language . in every story in hindi with images for express moral value.

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