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kahani new पंडित और ठग

एक बार पंडित को पूजा कराने पर दान में बछड़ा मिला। जहां वह पूजा कराने गया था, वहां से उसका घर 10 किलोमीटर दूर था। गांव के चार ठगों ने इस बछड़े को देख लिया था। उन्होंने उसे हथियाने की साजिश रची।

जैसे ही पंडित गांव से बछड़ा लेकर रवाना हुआ, रास्ते में उसे पहला ठग मिला और कहने लगा, “पंडित महाराज, यह तुम क्या कर रहे हो? तुम तो एक धार्मिक व्यक्ति हो और अपने साथ ये  कुत्ता ले जा रहे हो। यह तो अच्छी बात नहीं है। इसे हटाओ।”

ठग की बात सुनकर पंडित हँसा और बोला, “अरे, तुम पागल हो गए हो क्या? यह कुत्ता नहीं है। यह तो बछड़ा है। बेहतर यही होगा कि तुम जाओ और अपना काम करो”।

पंडित एक किलोमीटर आगे चला होगा कि उसे दूसरा ठग मिल गया। वह बोला, “पंडितजी महाराज, यह हो क्या रहा है? आप तो धार्मिक आदमी हो और अपने साथ कुत्ते ले जा रहे हो।

इसे भगा दो”। इस ठग की बात सुनकर भी पंडित मुस्कुरा दिया और बोला, “क्या तुम्हें दिख नहीं रहा कि यह कुत्ता नहीं, बछड़ा है?”

पंडित आगे बढ़ा, थोड़ी देर चलने के बाद फिर एक ठग मिल गया और बोला, “पंडितजी, यह क्या कर रहे है? आप तो धार्मिक प्रवृत्ति के है और अपने साथ कुत्ता ले जा रहे हैं। यह तो अच्छी बात नहीं हैं। इस कुत्ते को छोड़ दीजिए”।

इस बार पंडित का रुख बदल गया। उसका आत्मविश्वास डगमगाने लगा। उसने कहा, “मुझे परेशान मत करो। मुझे पक्का भरोसा है कि यह कुत्ता नहीं, बछड़ा है।”

यह कहकर पंडित आगे चल दिया। फिर एक किलोमीटर आगे उसे चौथा ठग मिल गया। वह बोला, “अरे पंडित जी, आप यह क्या कर रहे हैं? धार्मिक व्यक्ति होकर भी अपने साथ कुत्ता ले जा रहे हैं।

यह तो बहुत ही बुरी बात है। इसे यहीं छोड़ दीजिए।”

इस बार पंडित को वाकई भरोसा हो गया कि वह अपने साथ बछड़ा नहीं, कुत्ता ले जा रहा है। उसने बछड़े को वहीं छोड़ दिया।

कहानी की शिक्षा- यदि कुछ लोग कहते हैं कि आप गलत हैं तो हमें इस पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं है।

This kahani new moral is -if some people say that you are wrong we do not need to believe on it.

सरदार भगत सिंह kahani new

This kahani is based on sardar bhagat singh (सरदार भगत सिंह) child age.

जब जलियांवाला बाग कांड हुआ था, उस वक्त सरदार भगत सिंह की उम्र कोई 12 साल ही रही होगी। इस सामूहिक हत्याकांड में दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे और हजारों गंभीर रूप से घायल थे।

जब भगत सिंह ने इस घटना के बारे में सुना तो उनके मन में अंग्रेजो के खिलाफ गुस्सा भड़क उठा। अगले दिन वह घर से स्कूल के लिए निकले, लेकिन स्कूल जाने के बजाय चुपचाप अमृतसर के लिए रवाना हो गए।

जालियावाला बाग पहुंचकर उन्होंने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने वहीं से खून से सनी मिट्टी उठाई और एक शीशे में भर ली। वे इस शीशी को अपने साथ ले आए।

भगत सिंह शाम को काफी देर से घर लौटे थे। उनकी छोटी बहन अमृत कौर ने उनसे पूछा कि “कहां चले गए थे? इतनी देर से क्यों लौटे हो? तुम्हारे हिस्से के आम मैंने बचाकर रखें है, चलो खा लो”।

इस पर भगत सिंह बोले, “आमों को छोड़ो, मैं तुम्हें एक चीज दिखाऊंगा।”

इसके बाद भगत सिंह ने बहन को वह शीशी दिखाई, जिसमें वे जलियांवाला बाग की मिट्टी भरकर लाए थे।

इसके बाद कुछ फूल लाए, शीशी को मेज पर रखकर उसके चारों ओर फूल रख दिया और उन्होंने नमन किया। ऐसा ही उन्होंने बहन से भी करने को कहा।

शहीदों की इस मिट्टी से भगत सिंह को हमेशा क्रांति की प्रेरणा मिलती रही।

अदालत का फैसला

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This kahani new is based on four friends company lose and Court verdict

एक बात चार दोस्तों ने मिलकर सूत का कारोबार शुरू किया। कपास की गाठे रखने के लिए उनके पास एक गोदाम था।

चूहे कहीं कपास की गाठों को कुतर न डालें, इस डर से चारों परेशान थे। इसलिए चारों ने मिलकर फैसला किया कि एक बिल्ली रख ली जाए।

बिल्ली रख ली गई। चारों को इस बिल्ली से बड़ा लगाव था, इसलिए उसके पैरों में सोने घुँघरू बाँध दिए। एक दिन जब बिल्ली कपास की एक गांठ के ऊपर से कूदी तो उसकी एक टांग में चोट आ गई। बिल्ली को लगड़ाते देख चारों बहुत परेशान हुए।

बिल्ली की चोटवाली टांग पर दवा लगाकर पट्टी बांध दी। थोड़ी ही देर बाद वह पट्टी ढीली होकर खुल गई और बिल्ली के साथ घिसटती रही। बिल्ली को तो इस बारे में कुछ पता नहीं था।

बिल्ली एक ऐसी जगह बैठ गई, जहां पास में आग जल रही थी। पट्टी ने आग पकड़ ली। बिल्ली अपने बचाव के लिए भागी और भागती हुई गोदाम में घुस गई,

जहां कपास की गांठे रखी हुई थी। थोड़ी ही देर में गोदाम में आग फैल गई और देखते ही देखते कपास की गाठे राख में तब्दील हो गई।

सभी ने बिल्ली के एक-एक पैर में घुंघरू बंधा था। इस तरह बिल्ली की हर टाँग एक व्यक्ति के हिस्से में थी। लेकिन बिल्ली की जिस टांग में चोट आई थी, उस टांग के हिस्सेदार पर बाकी तीनों लोगों ने नुकसान का आरोप लगाया और उससे व्यापार में हुई नुकसान की भरपाई की मांग करने लगे।

मामला अदालत में गया। दोनों पक्षो को सुनने के बाद जज ने फैसले में कहा, “इस मामले में घायल पैर की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।

बिल्ली जिन तीनों पैरो से गोदाम में पहुंची वे तो अच्छे थे। इसलिए इस मामले में स्वस्थ पैरवाले हिस्सेदारों को मिलकर चोटवाले पैर के हिस्से के व्यक्ति को मुआवजा देना चाहिए”।

दिल का डर

एक चूहा था। वह हमेशा इस बात से डरा रहता था कि बिल्ली उसे खा जाएगी। एक साधु चूहे के इस डर को समझ गया था। उसने चूहे को अपनी तंत्र विद्या से बिल्ली बना दिया। लेकिन बिल्ली बन जाने पर वह कुत्ते से डरने लगा।

इस पर साधु ने उसे बिल्ली से कुत्ता बना डाला। जब वह कुत्ते के रूप में आया तो उसे चीते का खौफ सताने लगा। इसके बाद साधु ने उसे फिर से चूहा बना दिया। उसे शिकारी  डर सता रहा था।

इस बार साधु ने उसे फिर से चूहा बना दिया। साधु बोला, “अब मै तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता, क्योंकि दिल तो तुम्हारा चूहे का ही है।”

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akbar birbal ki kahani

एक बार की बात है। राजा अकबर को गुस्सा बहुत  जल्दी आता था। अगर उन्हें कोई भी गुस्सा दिला देता तो वे छोटी सी छोटी बात पर बड़ी से बड़ी सजा दे देते थे।

यह बात बीरबल को अच्छी तरह पता था। और सिर्फ वही थे, जो शहंशाह अकबर के गुस्से को शांत कर सकते थे।

एक दिन की बात है। अकबर शहंशाह अपने ख्वाबगाह में पहुंचे, तो देखा कि ख्वाबगाह के चारो  दीवारें रंगी है। यह दीवारें बैगनी रंग की रंगी थी। यह देखकर उन्हें बहुत ही गुस्सा आ गया।

उन्होंने सिपाही को बुलाया और पूछा, “हमारे ख्वाबगाह के दीवारों के लिए यह रंग किसने चुना है”।

सिपाही को डर के मारे आवाज नहीं निकल रही थी। राजा अकबर को और गुस्सा आ गया और बोले, “तुम जवाब क्यों नहीं दे रहे हो? तुम्हें कहने को लफ़्ज़ नहीं मिल रहे हैं”। READ MORE

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