Hindi story of kids with moral in short

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Hindi story with moral

Hindi story with moral

अजातशत्रु ने अपने पिता राजा बिंबसार की हत्या कर मगध के साम्राज्य पर कब्जा कर लिया और गद्दी पर बैठ गया। जैसे ही कुछ दिन गुजरे, उसे अपने किए का बहुत दुःख हुआ। वह अपने इस पाप का प्राशिचत करना चाहता था।

इसलिए उसने अपने पुजारियों को बुलाया और पूछा कि उसे अपने इस घृणित कार्य के पाप से किस तरह से मुक्ति मिल सकती है।पुजारियों ने उसे पशु बलि यज्ञ कराने की सलाह दी।

पशु बलि यज्ञ की तैयारियां शुरू कर दी गई और पुरे साम्रज्य में उसका ऐलान भी कर दिया गया। इसी बीच मगध में भगवान बुद्ध का आगमन हुआ। जैसे ही अजातशत्रु को इसकी खबर लगी, वह भगवान बुद्ध से मिलने पहुँचा।

अजातशत्रु भगवान बुद्ध से मिला और उसने सारी बात बताई।अजातशत्रु की सारी बात उसने के बाद भगवान बुद्ध ने उससे उसके पास से ही एक फूल तोड़ लाने को कहा।

अजातशत्रु फूल तोड़ कर ले आया। तब बुद्ध ने उससे कहा, “जाओ! दूसरा फूल भी तोड़ कर लाओ, ताकि पहलेवाला फूल खिल सके”। इस पर अजातशत्रु ने भगवान बुद्ध से कहा, “यह तो असम्भव है। अगर मैं दूसरे फूल तोड़ लाऊ तो पहले वाला फूल कैसे खिल सकता है। “

इस पर भगवान बुद्ध बोले, तो फिर तुम किसी दूसरे को मार कर पहले की गई हत्या का प्रायश्चित कैसे कर सकते हो ? दूसरी गलती करके पहले वाली गलती को कभी भी नहीं सुधारा जा सकता है। इसका सिर्फ एक ही तरीका है की अब तुम अपना सारा जीवन इस प्राणीजगत की सेवा में लगा दो। चाहे वे इंसान हो, पेड़ पौधा हो या अन्य जीव हो।”

यह सुनकर अजातशत्रु उनके चरणों में गिर पड़ा और भगवान बुद्ध का अनुयायी बन गया।

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एक बार की बात है। किसी जंगल में एक खरगोश और कछुआ रहते थे। वह दोनों अच्छे दोस्त थे। वह हर काम एक साथ करते थे।

पर एक बात थी कि कछुआ काफी धीरे चलता था जब की खरगोश काफी तेज चलता था।इस बात पर खरगोश को काफी घमंड होता था। वह सोचता था कि किसी भी दौड में वही जीतेगा। एक दिन उसका यह घमंड काफी बढ़ गया। उसने कछुए से कह डाला, क्या तुम मुझसे दौड लगावगे।

इस कछुए ने कहा नहीं भाई मै दौड नहीं लगा सकता हु। इस पर खरगोश का घमंड और भी बढ़ गया। वह जंगल के दूसरे जानवरों से इस बारे में कहने लगा। मैं  कितना तेज दौडता हु पर कछुआ कितन धीरे-धीरे चलता है।

यह बात कछुए को जंगल के दूसरे जानवरों से पता चला। वह  बहुत ही क्रोधित और दुखी भी हुआ। उसने दौड को शिवकर किया। इस पर खरगोश ने सारे जंगल के जानवरों को बुलाया। सभी जानवर वहा आए। सभी जानवरों ने मिल कर दौड़ की दूरी को तय किया।

अगले दिन दौड़ होने का निश्चय किया गया। अगले दिन दौड शुरू हुई। खरगोश दौड़ने ने काफी तेज होने के कारण वह बहुत जल्द कछुए से बहुत आगे पहुंच गया। जब खरगोश पीछे देखा तो उसे कछुआ दूर दूर तक नजर नहीं आ रहा था।

फिर उसने सोचा कछुआ तो काफी धीरे धीरे चलता है क्यों ना मैं थोड़ा सा आराम कर लू। यह सब सोचने के बाद उसने एक घने पेड़ के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया। कुछ देर बाद उसे नींद आ गया और वह गहरी नीद में सो गया।

उधर कछुआ लगातार चलता रहा। वह कछुआ चलते चलते उस जगह पर पंहुचा जहा वह खरगोश आराम की नीद में सो रहा था।

उस कछुए ने बिना कुछ आवाज के वहाँ से आगे बढ़ गया। इस तरह वह कछुआ लगातार चलता रहा और अंत में दौड के आखिरी जगह पर पहुंच गया।

इधर उस खरगोश की आँख खुली तो उसे लगा वह कछुआ अभी पीछे ही है। उसने दौडना शुरू किया और मंजिल पर पंहुचा तो उसकी आखे फटी की फटी रह गई। उसने देखा की जंगल के सारे जानवर उस कछुए को जित की बधाई दे रहे है।

उसे अपने किए बर्ताव पर बहुत ही पछतावा हो रहा था। उसने कछुए से माफी मांगी।और वादा दिया की अब दोबारा वह ऐसा कभी नहीं करेगा।

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हिंदी कहानी (hindi story)भारत के गांवों में मुखिया को सरपंच कहा जाता है। इंद्रपाल एक गांव का सरपच था। वह बहुत बुजुर्ग हो गया था और उसका स्वस्थ भी गिर रहा था।

इसलिए उसने गांव के बुजुर्गो से कहा कि वह सरपंच के पद से सेवानिवृत्त होना चाहता है। नए सरपंच के नाम पर विचार हुआ। अंत में दो युवको करन और महिपाल के नाम पर आम सहमति बनी। वे दोनों ही उस गांव के  होनहार युवक थे।

काफी सोच विचार करने के बाद भी गांव के बुजुर्ग इस नतीजे पर नहीं पहुंचे पाए कि इनमें से किसे सरपंच चुना जाए। तब बुजुर्ग सरपंच ने उन दोनों की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।

वह गांव दोनों और से मुख्य राजमार्ग से एक मील की दुरी पर थी। गांव के सरपंच ने करन और महिलपाल को बराबर धन देकर कहा कि तुम दोनों को गांव को दोनों और से राजमार्ग से जोड़ने के लिए कच्चे मार्ग का निर्माण करना है।

करन अगले ही दिन से काम में जुट गया। उसने एक ठेकेदार नियुक्त किया, जो अपने साथ बड़ी संख्या में श्रमिकों को लेकर आया। उन्होंने सड़क के मार्ग में आने वाली झाड़ियों और पेड़ो का सफाया किया तथा कीचड़ को दबाकर मिटटी को एक सा कर दिया।

उसका मार्ग गांव के कबड़्डी मैदान के बीचो बीच से गुजर गया। बेहतर सड़क के निर्माण के लिए धन कम पड़ गया। दो ही दिन में ठेकेदार ने करन को बताया कि सड़क बनकर तैयार हो गई है।

दूसरी ओर महिलपाल ने कुछ श्रमिकों को इस काम के लिए नियुक्त किया। उसने अपने साथ इस कार्य में हाथ बटाने के लिए गांव के नवयुवको से श्रमदान की अपील की। सड़क आधी ही बनकर तैयार हुई थी कि उसके समक्ष बरगद का पुराना पेड़ आ गया।

महिलपाल ने कहा, “हम इस पेड़ को नहीं काटेंगे और इ सड़क को पेड़ के किनारे से ही थोड़ा सा मोड़ लेंगे।” सभी नवयुवको ने सड़क की मिटटी को एक समान करने में अपना योगदान दिया तथा सड़क के दोनों ओर मेड भी बना दी।

जब सड़क पूरी बनकर तैयार हो गई तो महिलपाल ने पाया की कुछ धन अभी भी शेष है। वह शहतूत के 100 छोटे पेड़ खरीद कर लाया, जिसे उसने नवयुवको के साथ मिलकर दोनों ओर सड़क के किनारे लगा दिया। फिर भी थोड़ा सा धन बचा रह गया।

तब महिलपाल ने उस बचे हुए पैसो की मिठाई खरीदकर अपने उत्साही नवयुवकों में बाँट दिया।

सड़क के पूरा होने का समाचार गांव के सरपंच को दिया गया। सरपंच दोनों सडको का मुआयना करने गए। वह करन के कार्य की उत्तमता से बहुत प्रभावित हुए। उसके द्वारा बनवाई गई सड़क बिलकुल पेशेवर तरीके से कुशलतापूर्वक बनाई गई थी। बाद में वह दूसरी सड़क को भी देखने गए। अपने सरपंच की राय सुनने के लिए वहाँ सभी नवयुवक मौजूद थे।

उन्होंने सरपंच को अपने द्वारा किया गया वृक्षारोपण दिखाया। बरगद के पेड़ को न काटने और उसके बगल से सड़क को मोड़ देने के कार्य से सरपंच विशेष रूप से प्रभावित हुए।

उसने नए सरपंच के रूप में महिलपाल के नाम की घोषणा की और कहा, “किसी नेता का सबसे महत्वपूर्ण गुण उसके द्वारा कराए गए कार्य का उत्तम होना नहीं बल्कि कार्य के प्रति उसका समर्पण भाव, विश्वसनीयता और समूह भावना पैदा करना है।

महिपाल इन सभी नवयुवकों का विश्वास जीतने में सफल रहा, इसलिए सभी ने उसके कार्य की अनुसरण किया। वह कार्य के प्रति ईमानदार रहा और उसने एक टीम का गठन करने में पसीना बहाया।

नेता अकेले ही नहीं नेता होता, वह व्यक्तियों  का नेता होता है और और इसलिए वह तथा उसकी बात भरोसे के लायक होते है। केवल ऐसे ही गुणोवाले व्यक्ति को नेता बनने के योग्य होते हैं”।

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